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एक बार पहले भी भटका था दर-बदर

Posted On: 22 May, 2013 मस्ती मालगाड़ी में

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हिन्दी सिनेमा को 100 साल हो चुके हैं पर हम शायद एक नाम को याद करना भूल गए हैं. चलिए उनके बारे में बातें करने से पहले उनके द्वारा लिखी गई कविता ‘आशा-निराशा’ की कुछ पक्तियों को याद कर लिया जाए.

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‘एक बार पहले भी भटका था दर-बदर,

तुझे खोकर,

वह पाने के लिए जिसकी आशा नहीं थी,

आज फिर भटक रहा हूं,

तुम्हें पाकर,

जो पाने की आशा थी उसे खोकर


Real Life Story: Balraj Sahni

एक अच्छे लेखक के साथ-साथ अभिनय की समझ रखने वाले अभिनेता बलराज साहनी हिन्दी सिनेमा का वो नाम हैं जिन्हें उस समय भी नहीं भुलाया जा सकता है जब हिन्दी सिनेमा हजार वर्ष पार कर चुका होगा. मई 2013 में हिन्दी सिनेमा 100 वर्ष का हो गया और इसी महीने मई, साल 1913 में रावलपिंडी के एक मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में एक लड़के का जन्म हुआ जिसका नाम युधिष्ठर साहनी रखा गया और बाद में चलकर इस नाम को बलराज साहनी के नाम से जाना गया. बलराज साहनी के अभिनय में खास बात यह थी कि उनका अभिनय दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ जाता था. फिल्म धरती के लाल, हमलोग, दो बीघा जमीन, कठपुतली, सोने की चिडिया, दो रास्ते, एक फूल दो माली, मेरे हमसफर और सट्टा बाजार जैसी तमाम फिल्में बलराज साहनी के अभिनय की कला को व्यक्त करती हैं.

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do bigha zaminलाहौर के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से बलराज साहनी ने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी की थी और पढ़ाई पूरी करने के बाद पिता के व्यापार में उनका हाथ बंटाने लगे. साल 1930 की बात है जब बलराज साहनी को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन में शिक्षक नियुक्त किया गया था तब वो और उनकी पत्नी दमयंती रावलपिंडी को छोड़कर शांति निकेतन चले गए थे. साल 1938 में बलराज साहनी ने महात्मा गांधी के साथ देश की सेवा के लिए भी काम किया था. पांच वर्ष तक बलराज साहनी ने बी.बी.सी. इंग्लैंड में लेखक के रूप में काम किया था और फिर साल 1943 में भारत लौट आए थे.


बलराज साहनी ने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर जरूर किया था लेकिन बचपन से ही उनकी इच्छा अभिनय में जाने की थी जिस कारण उन्होंने इप्टा (इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसियेशन) में शामिल हो मजमूदार के नाटक ‘इंसाफ’ में अभिनय किया. बलराज साहनी सिर्फ उन किरदारों को निभाना चाहते थे जो न केवल लोगों में जागरुकता पैदा कर सकें बल्कि समाज को नया नजरिया भी दे सकें. इसके साथ ही ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में इप्टा की ही निर्मित फिल्म ‘धरती के लाल’ में बलराज साहनी को अभिनेता के रूप में काम करने का मौका मिला.

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Balraj Sahni Biography

कम्यूनिस्ट विचार बलराज साहनी को प्रभावित करते थे जिस कारण उस समय में उन्हें बहुत बार जेल भी जाना पड़ा था. साल 1953 में बिमल राय के निर्देशन में बनी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ बलराज साहनी के फिल्मी कॅरियर की अहम फिल्म थी. इस फिल्म के माध्यम से बलराज साहनी ने एक रिक्शावाले के निजी जीवन से जुड़ी परेशानियों को दिखाया था. इस किरदार को सफलतापूर्वक निभाने के लिए बलराज साहनी ने स्वयं कोलकाता की सड़कों पर 15 दिनों तक खुद रिक्शा चलाया था और रिक्शेवालों से बातचीत करके उनके निजी जीवन से जुड़ी परेशानियों को सामने लेकर आए थे. ‘दो बीघा जमीन’ को कांस फिल्म महोत्सव में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया है और इस फिल्म को भारतीय सिनेमा की बेस्ट फिल्म माना जाता है.

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balraj sahniBalraj Sahni : Do Bigha Zameen

साल 1961 में रिलीज हुई फिल्म ‘काबुलीवाला’ में बलराज साहनी ने अभिनय करके बच्चों के दिल में एक विशेष छाप छोड़ दी थी. ऐसा नहीं था कि बलराज साहनी ने सिर्फ अभिनय की दुनिया में ही नाम कमाया था बल्कि एक लेखक के रूप में भी उनके नाम मशहूर हैं. साल 1960 में बलराज साहनी ने पाकिस्तानी दौरे के बाद ‘मेरा पाकिस्तानी सफरनामा’ और साल 1969 में सोवियत संघ के दौरे के बाद ‘मेरा रूसी सफरनामा’ किताब लिखी थी जिसे पढ़ने के बाद लोग यह जान गए थे कि वो जितने अच्छे अभिनेता हैं उससे ज्यादा बेहतर वो एक लेखक हैं. अभिनेता और लेखक के रूप में अपने आप को सफल बनाने के बाद बलराज साहनी ने फिल्म ‘लाल बत्ती’ का निर्देशन भी किया था.

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यह सच है कि जो व्यक्ति पूरा जीवन केवल सच्चाई के रास्ते पर चलता है उस व्यक्ति को अपने अंत समय में सच्चाई का साथ निभाने की कीमत मिलती है. ऐसा ही बलराज साहनी के साथ भी हुआ. साल 1973 में रिलीज हुई निर्देशक एम.एस. सथ्यू की फिल्म ‘गर्म हवा’ बलराज साहनी की मौत से पहले की सफल फिल्मों में से एक है. उन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम समय में भी हिन्दी सिनेमा को ‘गर्म हवा’ जैसी मशहूर और सच्चाई पर आधारित फिल्म दी. 13 अप्रैल साल 1973 को भारत ने जो खोया शायद उस जैसा चिराग अब कभी जन्म ले. बलराज साहनी ने इस दिन दुनिया को हंसते हुए और सच्चाई के रास्ते पर चलने का नारा देते हुए हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. सच में बलराज साहनी की लिखी हुई कविता ‘आशा-निराशा’ की यह पक्तियां ‘वह पाने के लिए जिसकी आशा नहीं थी…आज फिर भटक रहा हूं तुम्हें पाकर, जो पाने की आशा थी उसे खोकरजिंदगी भर यादों में रह जाएंगी.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ऋषभ शुक्ला के द्वारा
May 22, 2013

सुन्दर लेख के लिए बधाई आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया


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